साहित्य किसी भी समाज की सृजनता में सबसे अहम् और प्रभावशाली प्रतिरूप होता है ! कला और कलाकार ही समाज को जिन्दा रखती है ,या यूँ कह लीजिय की कला एक सामाजिक चेतना है ! किसी भी कलाकार या कला की अभिव्यक्ति पर हमला समाज की चेतना पर हमला है ,उसे मारने की साजिश है ! अभिव्यक्ति का शोषण एक वैचारिक बलात्कार की तरह ही है ! एक कवि,लेखक ,कार्टूनिस्ट ,चलचित्र ,चित्र ,छायाप्रति ,नायक की सफलता या उसकी आत्मनियमन की संतुष्टि इस बात पर निर्भर करती है ,वह भाव को कितने मूल रूप में अभिव्यक्त कर पाया ,और यदि वह इसमें सफल हुआ तो यह भी तय है की एक सामाजिक प्रभाव और बदलाव भी अपेक्षित है !
कोई भी कलाकार सीमाए तोड़ता है ,सीमाएं तोडना भी बेहद मुलभुत आवश्यकता है , सीमाएं तोडना और उसकी लक्ष्मण रेखा का रेखांकन चर्चा का विषय हो सकता है ! सोचीय यदि कोई कवि अपनी प्रेमिका को कहता है की :-
तमन्ना थी चाँद को देखू करीब से
पर आपको देख कर यकीं हुआ वो चाँद तो झूठा है !
पर आपको देख कर यकीं हुआ वो चाँद तो झूठा है !
या कहता है की __ _ _
क्या खुदा !
क्या खुदा !
हमने खोदा तो खुदा !
क्या खुदा !
हमने खोदा तो खुदा !
तो क्या चाँद और खुदा उस कवि को कठगरे में खड़ा कर देंगे ,उसे फूहड़पन की संज्ञा देंगे ,जबकि आप तो उसे सायद एक बेहतरीन कवि की संज्ञा दे देंगे !
कलात्मक अभिव्यक्ति मानसिक उदारीकरण की अपेक्षा रखता है , हर कलात्मक अभिव्यक्ति की अपनी एक आत्मा होती है ! कवितायें अलंकृत भावमय और सीमा तोडती अभिव्यक्ति है ! उसी तरह एक और महत्वपूर्ण मौन अभिव्यक्ति का सबसे आक्रमक ,ताकतवर ,व्यंगात्मक स्वरूप है कार्टून !
एक कार्टून की मूल भाषा व्यंगात्मक होती है ! यदि आप उसकी इस अभिव्यक्ति के व्यंग का वैचारिक बलात्कार करेंगे ,तो ये अभिव्यक्ति की ह्त्या करने जैसा ही है ,मे उसे किसी भी अपराधिक मनुष्य की तरह ही मानता हूँ !
एक कार्टून की मूल भाषा व्यंगात्मक होती है ! यदि आप उसकी इस अभिव्यक्ति के व्यंग का वैचारिक बलात्कार करेंगे ,तो ये अभिव्यक्ति की ह्त्या करने जैसा ही है ,मे उसे किसी भी अपराधिक मनुष्य की तरह ही मानता हूँ !
अभी हाल ही मे असीम त्रिवेदी द्वारा बनाये कार्टून पर चिल पौ की कुत्ता भौंकी अभिव्यक्तिखोर फांसीवाद का सबसे कुरूप रूप है ! असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी, कार्टून पर बैन , कला को नंगा कर बीच चौराहे पर घुमाने जैसा ही है ! पर यह भी सच है की एक कलाकार को समझने के लिए एक कलाकार का दिल होना भी बेहद आवश्यक है ! दुर्भाग्य से हमारी निजामिक प्रकिरिया, उसके पहरुओं में इसका अकाल है !
यदि आप को कोई बेहद अश्लील गाली दे , फिर आपसे पूछा जाए उसने क्या कहा तो आपका जबाब उतनी ही अश्लीलता अभिव्यक्त कर पाया तो ही आप अपनी मूल बात पहुचा पायेंगे !
ये ठीक वैसा ही की एक बलात्कार की शिकार युवती से कहा जाए की आप बड़े ही शालिल शब्दों में मर्यादापूर्वक अपनी आप बीती बताएं ,तो क्या उसके साथ बीती जघन्यता और विद्रूपता को ना बताने देना उसके साथ किया एक और मानसिक बलात्कार सा नहीं है !
ये ठीक वैसा ही की एक बलात्कार की शिकार युवती से कहा जाए की आप बड़े ही शालिल शब्दों में मर्यादापूर्वक अपनी आप बीती बताएं ,तो क्या उसके साथ बीती जघन्यता और विद्रूपता को ना बताने देना उसके साथ किया एक और मानसिक बलात्कार सा नहीं है !
चलिय एक दम सपष्ट रूप में असीम द्वारा बनाये कुछ कार्टून पर खुले रूप में चर्चा कर लेते है ! एक कार्टून जिसकी अभी कंही चर्चा नहीं है जिसमे भारत माता को खींचते कुछ नेताओं की भारतीय समाज में व्याप्त कुछ बेहद कुरूप विसंगतियों के रूप में दिखाया गया ,जिसके साथ गैग रेप जैसे शब्दों का इस्तेमाल है ,
आप ही बताएं आज जब राजनेता हमारा देश इतनी निर्दयता से लुट रहे हों ,तो कार्टून में निहित आक्रामक व्यंगात्मक्ता कंहा से अनुचित है ,
एक दुसरे कार्टून में जिसकी चर्चा आम जनस्तर से बड़े राजनैतिक गलियारों में शोर मचा रही है ,जिसमे कसब संसद पर पेशाब कर रहा है ! आप संसद को ही ले लिजिय जिस तरह वहा सांसदिक आचरण का नंगा नाच होता है ,क्या वह संसद पर पेशाब करने सा नहीं है ,अब आप ही बताएं वह शख्स जिसने जलियावाले बाग़ की तरह अंधाधुंध गोलिया चला बर्बरता दिखाई, फिर हमारे ही कानून प्रणाली का प्रयोग कर हमारे घावों पर नमक छिड़कने का उसका दुस्साहस , क्या हमारे संसद का अपमान नहीं है ?
राष्ट्रिय प्रतीक चिह्न हमारा गौरव है ,निर्जीव माडल भर नहीं है ,हर राष्ट्रिय प्रतीक चिह्न आज किसी ना किसी रूप में आहत है , ,कार्टूनिस्ट का इस कथ्य को उतनी ही सच्चाई में व्यक्त कर पाना मेरे लिए तो उसकी राष्ट्प्रेम और कलात्मक शिर्शोउन्नत अभिव्यक्ति है !
इन फांसीवादी अभिव्यक्तिखोरों को समझना होगा हर कला ,विधा का अपना रूप होता है ,उसके मूल स्वर को बदलना अभिव्यक्ति के साथ बलात्कार करने सा ही है ! यदि हम इसी तरह कला का कंठ काटते रहे तो विश्व पटल पर ,कला और साहित्य का सबसे बड़ा केंद्र भारत अपनी विश्व विख्यात प्रतिष्ठा खो देगा ! हमें अपने ही भीतर बैठे फांसीवादी अभिव्यक्तिखोर मुर्खानंद से लड़ना होगा और एक उदारवादी साहित्यिक दृष्टिकोण से अपनी इस मानसिक रतौंधी को दूर करना होगा !
अब वक़्त आ गया है की हम धरा 124 ( A ) जैसे फासीवादी कानूनों को बदले या तो उन्हें सविधान से निकाल फेंके ,वह कानून जो कहता है आप किसी सरकार के खिलाफ कोई भी वैचारिक मतभेदिक टिपण्णी नहीं कर सकते है ,यह हमारी ही लोकतांत्रिक प्रणाली और मौलिक अधिकारों का हनन और विरोधाभास है ! इसकी समीक्षा सुप्रीम कौर्ट द्वारा भी की गई जिसमे ये कहा गया की यदि कोई अभिव्यक्ति किसी भी सामाजिक ढांचे की व्यवस्था में शांति भंग कर हिंसात्मक बदलाव नहीं लाती वह इस कानून के दायरे से बाहर है ! इसी कानून अधिनियम के तहत असीम को गिरफ्तार किया गया, जो की बेहद हास्यापद और दुर्भाग्यपूर्ण है ! मेरे लिए किसी कानून पर बहस करना मूल बात से भटकने जैसा ही हैं ,क्यूंकि इतिहास गवाह कानून का इस्तेमाल और उसका दयनीय दरिद्र स्वरूप नेता के घर में पोछा मारने वाली काम वाली बाई जैसा ही है !
**एक और चुतिया कानपूर से अजी मैं खुद **
