Thursday, 20 September 2012

जघन्यता और विद्रूपता


साहित्य किसी भी समाज की सृजनता में सबसे अहम् और प्रभावशाली प्रतिरूप होता है ! कला और कलाकार ही समाज को जिन्दा  रखती है ,या यूँ कह लीजिय की कला एक सामाजिक चेतना है ! किसी भी कलाकार या कला की अभिव्यक्ति पर हमला समाज की चेतना पर हमला है ,उसे मारने की साजिश है ! अभिव्यक्ति का शोषण एक वैचारिक बलात्कार की तरह ही है ! एक कवि,लेखक ,कार्टूनिस्ट ,चलचित्र ,चित्र ,छायाप्रति ,नायक की सफलता या उसकी आत्मनियमन की संतुष्टि इस बात पर निर्भर करती है ,वह भाव को कितने मूल रूप में अभिव्यक्त कर पाया ,और यदि वह इसमें सफल हुआ तो यह भी तय है की एक सामाजिक प्रभाव और बदलाव भी अपेक्षित है !
कोई भी कलाकार सीमाए तोड़ता है ,सीमाएं तोडना भी बेहद मुलभुत आवश्यकता है , सीमाएं तोडना और उसकी लक्ष्मण रेखा का रेखांकन चर्चा का विषय हो सकता है ! सोचीय यदि कोई कवि अपनी प्रेमिका को कहता है की :-
तमन्ना थी चाँद  को देखू करीब से
पर आपको देख कर यकीं हुआ वो चाँद तो झूठा है !
या कहता है की __ _ _
क्या खुदा !
क्या खुदा !
हमने खोदा तो खुदा !
तो क्या चाँद और खुदा उस कवि को कठगरे में खड़ा कर देंगे ,उसे फूहड़पन की संज्ञा देंगे ,जबकि आप तो उसे सायद एक बेहतरीन कवि की संज्ञा दे देंगे !
कलात्मक अभिव्यक्ति मानसिक उदारीकरण  की अपेक्षा रखता है , हर कलात्मक अभिव्यक्ति की अपनी एक आत्मा होती है ! कवितायें अलंकृत भावमय और सीमा तोडती अभिव्यक्ति है ! उसी तरह एक और महत्वपूर्ण मौन अभिव्यक्ति का सबसे आक्रमक ,ताकतवर ,व्यंगात्मक स्वरूप है कार्टून !
एक कार्टून की मूल भाषा व्यंगात्मक होती है ! यदि आप उसकी इस अभिव्यक्ति के व्यंग का वैचारिक बलात्कार करेंगे ,तो ये अभिव्यक्ति की ह्त्या करने जैसा ही है ,मे उसे किसी भी अपराधिक मनुष्य की तरह ही मानता हूँ 
!
अभी हाल ही मे असीम त्रिवेदी  द्वारा बनाये कार्टून पर चिल पौ की कुत्ता भौंकी अभिव्यक्तिखोर फांसीवाद का सबसे कुरूप रूप है ! असीम त्रिवेदी की गिरफ़्तारी, कार्टून पर बैन , कला को नंगा कर बीच चौराहे पर घुमाने जैसा ही है ! पर यह भी सच है की एक कलाकार को समझने के लिए एक कलाकार का दिल होना भी बेहद आवश्यक है ! दुर्भाग्य से हमारी निजामिक प्रकिरिया,  उसके पहरुओं में इसका अकाल है !
यदि आप को कोई बेहद अश्लील गाली दे , फिर आपसे पूछा जाए उसने क्या कहा तो आपका जबाब उतनी ही अश्लीलता अभिव्यक्त कर पाया तो ही आप अपनी मूल बात पहुचा पायेंगे !
ये ठीक वैसा ही की एक बलात्कार की शिकार युवती से कहा जाए की आप बड़े ही शालिल शब्दों में मर्यादापूर्वक  अपनी आप बीती बताएं ,तो क्या उसके साथ बीती जघन्यता और विद्रूपता को ना बताने देना उसके साथ किया एक और मानसिक बलात्कार सा नहीं है !
corruption
चलिय एक दम सपष्ट रूप में असीम द्वारा बनाये कुछ कार्टून पर खुले रूप में चर्चा कर लेते है ! एक कार्टून  जिसकी  अभी कंही चर्चा नहीं है जिसमे भारत माता को खींचते कुछ नेताओं की भारतीय समाज में व्याप्त कुछ बेहद कुरूप विसंगतियों के रूप में दिखाया गया ,जिसके साथ गैग रेप जैसे शब्दों का इस्तेमाल है ,
आप ही बताएं आज जब राजनेता हमारा देश इतनी निर्दयता से लुट रहे हों ,तो कार्टून में निहित आक्रामक व्यंगात्मक्ता कंहा से अनुचित है ,
एक दुसरे कार्टून में जिसकी चर्चा आम जनस्तर से बड़े राजनैतिक गलियारों में शोर मचा रही है ,जिसमे कसब संसद पर पेशाब कर रहा है ! आप संसद को ही ले लिजिय जिस तरह वहा सांसदिक आचरण का नंगा नाच होता है ,क्या वह संसद पर पेशाब करने सा नहीं है ,अब आप ही बताएं वह शख्स जिसने जलियावाले बाग़ की तरह अंधाधुंध गोलिया चला बर्बरता दिखाई,  फिर हमारे ही कानून प्रणाली का प्रयोग कर हमारे घावों पर नमक छिड़कने का उसका दुस्साहस , क्या  हमारे संसद का अपमान नहीं है ?
राष्ट्रिय प्रतीक चिह्न हमारा गौरव है ,निर्जीव माडल भर नहीं है ,हर राष्ट्रिय प्रतीक चिह्न आज किसी ना किसी रूप में आहत है , ,कार्टूनिस्ट का इस  कथ्य को उतनी ही सच्चाई में व्यक्त कर पाना मेरे लिए तो उसकी राष्ट्प्रेम और कलात्मक शिर्शोउन्नत अभिव्यक्ति है !
इन फांसीवादी अभिव्यक्तिखोरों  को समझना होगा हर कला ,विधा का अपना रूप होता है ,उसके मूल स्वर को बदलना अभिव्यक्ति के साथ बलात्कार करने सा ही है ! यदि हम इसी तरह कला का कंठ काटते रहे तो विश्व पटल पर ,कला और साहित्य का  सबसे   बड़ा केंद्र भारत अपनी विश्व विख्यात प्रतिष्ठा  खो  देगा ! हमें अपने ही भीतर बैठे फांसीवादी अभिव्यक्तिखोर मुर्खानंद से लड़ना होगा और एक उदारवादी साहित्यिक दृष्टिकोण से अपनी इस मानसिक रतौंधी को दूर करना होगा !
अब वक़्त आ गया है की हम धरा 124 ( A ) जैसे फासीवादी  कानूनों को बदले या तो उन्हें सविधान से निकाल फेंके ,वह कानून  जो कहता है आप किसी सरकार के खिलाफ कोई भी वैचारिक मतभेदिक टिपण्णी नहीं कर सकते  है ,यह हमारी ही लोकतांत्रिक प्रणाली और मौलिक अधिकारों का हनन और विरोधाभास  है ! इसकी समीक्षा सुप्रीम कौर्ट द्वारा भी की गई जिसमे ये कहा   गया की यदि कोई अभिव्यक्ति किसी भी सामाजिक  ढांचे  की व्यवस्था में शांति भंग कर हिंसात्मक बदलाव नहीं लाती वह इस कानून के दायरे से बाहर है ! इसी कानून अधिनियम के तहत असीम को गिरफ्तार किया गया, जो की बेहद हास्यापद और दुर्भाग्यपूर्ण है ! मेरे  लिए किसी कानून  पर बहस करना मूल बात से भटकने जैसा ही हैं ,क्यूंकि इतिहास गवाह कानून का इस्तेमाल और उसका दयनीय दरिद्र स्वरूप नेता के घर में पोछा  मारने वाली काम वाली बाई जैसा ही है !
                      **एक और चुतिया कानपूर से अजी मैं खुद **

मुस्लिम वोटों की भूखी तथाकथित सेकुलर पार्टियों


        मुस्लिम वोटों की भूखी तथाकथित सेकुलर पार्टियों और हिंदू संगठनों को पानी पी पी कर कोसने वाले मिशनरी स्कूलों से निकले अंग्रेजीदां पत्रकारों और समाचार चैनलों को उनकी याद भी नहीं आती |गुजरात दंगों में मरे साढ़े सात सौ मुस्लिमों के लिए जीनोसाईड जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले सेकुलर चिंतकों को अल्लाह के नाम पर क़त्ल किए गए दसियों हज़ार कश्मीरी हिंदुओं का ध्यान स्वप्न में भी नहीं आता | सरकार कहती है कि कश्मीरी हिंदू “स्वेच्छा से” कश्मीर छोड़ कर भागे | इस घटना को जनस्मृति से विस्मृत होने देने का षड़यंत्र भी रचा गया है | आज की पीढ़ी में कितने लोग उन विस्थापितों के दुःख को जानते हैं जो आज भी विस्थापित हैं | भोगने वाले भोग रहे हैं | जो जानते हैं, दुःख से उनकी छाती फटती है, और आँखें याद करके आंसुओं के समंदर में डूब जाती हैं और सर लज्जा से झुक जाता है | रामायण की देवी सीता को शरण देने वाली भारत की धरती से उसके अपने पुत्रों को भागना पड़ा |
कवि हरि ओम पवार ने इस दशा का वर्णन करते हुए जो लिखा, वही प्रत्येक जानकार की मनोदशा का प्रतिबिम्ब है -
“मन करता है फूल चढा दूँ लोकतंत्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर” |
जागो हिन्दुओं …
और सेकुलरो … सालो… अगर थोड़ी भी शर्म बची हो तो डूब मरो चुल्लू भर पानी में.. अन्यथा कल को तुम्हे वो पानी भी नसीब नहीं होने वाला है…!
इसलिए …. फालतू की नौटंकी तथा झूठा भाई-चारा बंद करो और……. गर्व से कहो हम हिन्दू हैं…!
क्योंकि…. जो हो चूका है उसे लौटाया तो नहीं जा सकता है परन्तु…. जागरूक और एकजुट रहकर अपने वर्तमान में उसकी पुनरावृति को जरुर रोका जा सकता है और, अपने भविष्य को सुनहरा बनाया जा सकता है…..!!

Sunday, 16 September 2012

गीता हो राष्‍ट्रीय ग्रन्‍थ

इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय - गीता हो राष्‍ट्रीय ग्रन्‍थ और मदिंरों और हिन्‍दुओं का संगरक्षण दे सरकार
इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने अपने ताजे फैसले में कहा कि मंदिर या कोई भी धार्मिक संस्था की संपत्ति जिला न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बगैर बेची नहीं जा सकती, ऐसी बिक्री शून्य व अवैध मानी जायेगी। तथा राज्‍य सरकार को निर्देश जारी किया कि एक तदर्थ बोर्ड का गठन किया जाये, तब तक के लिये कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति आरएम सहाय की अध्यक्षता में तदर्थ बोर्ड गठित करने के साथ ही सरकार को निर्देश दिया है कि वह मंदिरों व धार्मिक संस्थाओं की रक्षा के लिए विशेष पुलिस बल बनाये और यह कार्यवाही तीन माह में पूरी कर दी जाये।
माननीय न्‍यायमूर्ति ने 104 पृष्ठ का निर्णय में इतिह‍ास के साक्ष्‍य प्रकट करते हुए कहा कि विगत 1300 वर्षो से लगातार सांप्रदायिक एवं समाज विरोधी तत्वों द्वारा हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त किया जा रहा है इस प्रकार के प्रकरणों से सीख लेते हुए राज्य का यह दायित्व है कि वह हिन्दू मंदिरों व धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान करे और इसके लिए अलग से पुलिस बल या स्पेशल सेल गठित किया जाये।
न्‍यायालय ने धर्मिक स्‍वतंत्रता से सम्‍बन्धि स‍ंविधान की अनुच्‍छेद 25 व 26 का जिक्र करते हुऐ कहा कि हिन्दुओं को भी धार्मिक आजादी का पूर्ण संरक्षण मिलना चाहिए क्‍योकि आजादी के बाद से कुछ विशेष सम्‍प्राद के व्‍यक्तियों की जनसंख्‍या पूरे भारत के कुछ जिले/मोहल्‍लों में अप्रत्‍याशित रूप से वृद्धि हुई है। और इसके फल स्‍वरूप हिन्‍दू जनसंख्‍या अपनी सुरक्षा के लिये अपनी जमीन व मंदिर की संपत्ति बेचकर सुरक्षित हिन्दू बहुल क्षेत्रों में बस रहे है।
न्‍यायालय ने राज्‍य को निर्देशित किया कि मंदिरों की सुरक्षा के लिए कानून बनाये ताकि समाजविरोधी सांप्रदायिक तत्वों के मंदिरों पर हमले की प्रवृत्ति पर रोक लगायी जा सके। इसी के साथ न्यायालय ने तिलभांडेश्वर वाराणसी स्थित श्री शालिगराम शिला गोपाल ठाकुर की प्रतिमा पुनस्र्थापित कर रखरखाव का निर्देश दिया है और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह मंदिर के सेवाइती को पूर्ण सहयोग प्रदान करे ताकि मंदिर में राग, भोग व पूजा शांतिपूर्ण ढंग से चलती रहे। एक संप्रदाय की बढ़ती आबादी व तनाव के चलते मंदिर बेचकर उसे इलाहाबाद लाया जा रहा था। इस मामले में न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को रद कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति एसएन श्रीवास्तव ने गोपाल ठाकुर मंदिर के सेवाइत श्यामल राजन मुखर्जी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
न्यायालय ने हिन्दू मंदिरों की देखरेख व सुरक्षा के लिए राज्य सरकार को हिन्दू मंदिरों का बोर्ड गठित करने को भी कहा, जो मंदिरों का पंजीकरण, रखरखाव व प्रबंधन का काम देखेगा इसके सदस्‍य सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय तथा प्रमुख सचिव धर्मादा उप्र सरकार सदस्य सचिव होंगे। माननीय न्‍यायालय ने तदर्थ बोर्ड से कहा कि मामले की जॉच कर चार माह में राज्य सरकार को रिर्पोट सौंप दें। और राज्‍य सरकार को भी आदेश दिया कि वह किसी को भी मंदिरों या धार्मिक संस्थाओं, मठ आदि की संपत्ति बेचने की अनुमति न दे जब तक कि जिला न्यायाधीश की अनुमति न प्राप्त कर ली गई हो

एक अन्‍य मामले में माननीय न्‍यायमूर्ति श्री श्रीवास्‍तव ने फैलसा देते हुए कहा कि राष्ट्रीय ध्वज , राष्ट्रगान , राष्ट्रीय पक्षी और राष्ट्रीय पुष्प के समान भगवद्गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित किया जाना चाहिए। जस्टिस श्रीवास्तव ने वाराणसी के गोपाल ठाकुर मंदिर के पुजारी श्यामल राजन मुखर्जी की याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि देश की आजादी के आंदोलन की प्रेरणास्रोत रही भगवद्गीता भारतीय जीवन पद्धति है। उन्होंने कहा कि इसलिए संविधान के अनुच्छेद 51( ए ) के तहत देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शों पर अमल करें और इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करें।
न्‍यायालय ने अपने आदेश में कहा कि भगवद्गीता के उपदेश किसी खास संप्रदाय की नहीं है बल्कि सभी संप्रदायों की गाइडिंग फोर्स है। गीता के उपदेश बिना परिणाम की परवाह किए धर्म के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। यह भारत का धर्मशास्त्र है जिसे संप्रदायों के बीच जकड़ा नहीं जा सकता। न्‍यायमूर्ति एसएन श्रीवास्तव ने कहा कि संविधान के मूलकर्तव्यों के तहत राज्य का यह दायित्व है कि भगवद्गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र की मान्यता दे।
न्‍यायलय ने यह भी कहा कि भारत में जन्मे सभी सम्प्रदाय, सिख, जैन, बौद्ध आदि हिदुत्व का हिस्सा है जो भी व्यक्ति ईसाई, पारसी, मुस्लिम, यहूदी नहीं है वह हिन्दू हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 के तहत अन्य धर्मो के अनुयायियों की तरह हिन्दुओं को भी अपने सम्प्रदायों का संरक्षण प्राप्त करने का हक है। न्यायालय ने कहा है कि भगवत् गीता हमारे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों की संवाहक है यह हिन्दू धर्म के हर सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करती है इस लिए प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शो को अमल में लाये।
माननीय न्‍यायमूर्ति के इन फैसलों से इस अल्‍पसंख्‍यकों की वस्तविकता स्‍पष्‍ट करती है वरन इलाहाबाद और आगरा की घटनाओं के बाद हुई हिंसा से इनकी कट्टारता भी प्रकट करती है। इसके पूर्व में भी माननीय न्‍यायमूर्ति ने मुस्लिम अल्‍पसंख्‍यक नही का जो फैसला दिया था वह गलत नही था। क्‍योकि आज वे संख्‍या में भले हिन्‍दु से कम है किन्‍तु आज जिन इलाकों में वे हिन्‍दुओं से संख्‍याबल में ज्‍यादा है वहॉं पर हिन्‍दुओं का सर्वधिक अहित हुआ है। अगरा में ट्रक के टक्‍कर के परिणाम हिन्‍दुओं की दुकानों को लूट कर किया गया इलाहाबाद के करेली की अफवाह के परिणाम स्‍वरूप हिन्‍दु बस्‍ती की तरफ हमले की योजना रची गई अगर कर्फ्यू न लगा होता तो शायद वस्‍तु‍ स्थिति कुछ और होती तथा इसके साथ ही साथ कर्फ्यू के कारण कई परिवारों के भोजन नही नसीब नही हुआ। वास्‍तव आज न्‍यायालय के निर्णय समाज और सरकार को वस्तिविकता का शीशा दिखा रहा है। जो सरकार आज अल्‍पसंख्‍यक वाद का ढोग रच रही है उसे वास्तविकता के आगे जागना होगा।
माननीय न्‍यायमूर्ति जी को उनके फैसले तथा स्‍वर्णिम कार्यकाल के लिये हार्दिक शुभकामनाऐं।

Tuesday, 24 April 2012

अंतिम साथ और अंतिम दिवस

                                              हो  गमो  में  इतनी  चूर  गयी.
                                               चली    मैं   इतनी  दूर   गयी |
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                                                           जिन्दगी की 
                                                           हर   सौगाते 
                                                           सारे    रिश्ते 
                                                            सारे    नाते,
                                                           धूमिल   ऐसे 
                                                           नूर      हुए 
                                                           पल   भर में 
                                                           हमसे दूर हुए,|
                                              हो  गमो  में  इतनी  चूर  गयी.
                                              चली   मैं    इतनी   दूर   गयी|
                                                        तुम बिन सूना 
                                                        हर पल    मेरा 
                                                        याद       बहुत 
                                                        करती कल तेरा.
                                                         देख     त्रासदी 
                                                         काया       रोई .
                                                        देख    मुझे  ना 
                                                         पाया      कोई.|
                                              हो  गमो  में  इतनी  चूर  गयी.
                                              चली   मैं    इतनी   दूर   गयी|
                                                       सोचती रहती थी
                                                        मैं         जिनको
                                                       भूल   गए     सब.
                                                        आज     हमीको
                                                        आया न    कोई 
                                                        पास    में   मेरे, 
                                                        बस  साया    था
                                                        साथ   में    मेरे |
                                               हो  गमो  में  इतनी  चूर  गयी.
                                              चली   मैं    इतनी   दूर   गयी |
                                                       इश  दुनिया   के 
                                                       युद्ध     क्षेत्र   में. 
                                                        हर    योधा  के
                                                       परम  नेत्र    में.
                                                      ऐसे   नीर     को 
                                                       बहते        देखा,
                                                      चला   कोई   हो  
                                                      धीर          गयी |
                                              हो  गमो  में  इतनी  चूर  गयी.
                                              चली   मैं    इतनी   दूर   गयी |